एक दिवस माता ने इन्हें स्वप्न में पहाड़ी में होने का संकेत दिया| शुक्ल जी इस विषय में आपने माता पिता को सूचित किया और सारा वृतांत बताया जिसे माता पिता के द्वारा केबल स्वप्न मानकर भूल जाने को कहा | फिर माता के आदेशानुसार स्व. श्रवण कुमार शुक्ल जी ने पहाड़ी में जाने का निश्चय किया वह माता की एक छोटी सी मढिया थी फिर शुक्ल जी में राज्यपरिवहन की नौकरी से त्यागपत्र देकर सेवा को समाप्त किया |
इसके बाद राज्यपरिवहन से नौकरी छोड़ने पर लगभग 70,000 रुपए मिले जिससे आपने श्री शारदा मंदिर निर्माण कार्य आरंभ करवाया और माता के आशीर्वाद से 15 जून 1975 को संपन्न हुआ और साथ की मंदिर तक पहुचने के लिए रास्ते को दुरुस्त करने का कार्य किया| पूर्व मंत्री श्री विमला जी ने रोड का डामरीकरण किया | पर माता जो चाहती हैं वो होकर रहता है, माता ने स्वप्न में फिर पहाड़ी में होने का संकेत दिया | यह खूबसूरत ऊंचाई पर एक छोटी पहाड़ी पर बना हुआ है। नवरात्री के त्यौहार पर यहां श्रद्धालु की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस मंदिर के बारे में अनेक मान्यताएं प्रसिद्ध है।
1994 को माता शारदा ने शुक्ला जी को मुक्ति दी| शुक्ला जी के स्वर्गवास होने के पश्चात् आपकी पत्नी ने मंदिर के कार्यभार का निर्वहन किया और फिर शुक्ल जी पुत्र श्री आशीष शुक्ला जी और श्री अभय शुक्ला जी द्वारा मंदिर की कार्यकारणी का कार्यभार संपन्न किया जा रहा है |