मंदिर में विराजमान शीतला माई की प्रतिमा को लेकर भ्रांतियां हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो मंदिर में विराजमान शीतला माई की प्रतिमा गौड़कालीन है। वहीं कुछ इस प्रतिमा को ब्रिटिश काल की बताते हैं। मंदिर में प्राचीन प्रतिमा आज भी लोगों की आस्था का केन्द्र बनी हुई है। लोग इस प्रतिमा के पास मन्नत के नारियल बांधते हैं।
देवी शीतला की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को की जाती है। इस दिन शीतला माता का व्रत,पूजन किया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन शीतला मां की पूजा में बासी ठंडे पकवानों का माता को भोग लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में समस्त शीत जनित रोग ज्वर, चेचक, नेत्र विकार दूर होते हैं। प्राचीन काल में शीतला यानी चेचक की बीमारी महामारी के रूप में फैलती थी।
कुछ स्थानों पर शीतला अष्टमी का व्रत करने का भी विधान है। शीतला सप्तमी या शीतला अष्टमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं । उनकी प्रसन्नता से आरोग्यता प्राप्त होती है। मान्यता है कि जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते हैं।